Friday, November 21, 2008

कब रुकेंगे ये धमाके...

धर्मेंद्र कुमार
'सूरत में एक के बाद एक 18 धमाके, 100 से ज्यादा मरे'... न... न... चौंकिए नहीं... फिलहाल हम इस खबर से बाल-बाल बच गए हैं। मंगलवार को गुजरात पुलिस ने पूरी सक्रियता दिखाई और सूरत शहर में एक के बाद एक 18 बम ढूंढ निकाले। पुलिस ने शहर का हर कोना, हर पेड़, हर गड्ढा और हर लावारिस पड़ा टिफिन छान मारा, और बम ढूंढ़ लिए। अभी कुछ और बम भी मिल सकते हैं...

गौर कीजिए! यह सक्रियता तीन-चार दिन पहले, या कहिए हर रोज दिखाई जाती या यूं कहें कि यह 'रेड अलर्ट' रोज रहे तो क्या बेंगलुरु और अहमदाबाद जैसी घटनाओं से बचा नहीं जा सकता था! उजड़ गए 100 से ज्यादा परिवारों को बचाया नहीं जा सकता था! किसका दोष है यह... प्रशासन का, पुलिस का, नेताओं का या कोई और ही है इसका जिम्मेदार! समझ नहीं आता, किसके सिर थोपें इसका दोष! जब कोई घटना घट जाती है तो हममें न जाने कहां से यह अतिरिक्त फुर्ती आ जाती है। हमारे पुलिसकर्मी शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट हो जाते हैं! अधिकारियों द्वारा पर्याप्त संख्या में पुलिसकर्मियों का न होने का दावा न जाने कहां फुर्र हो जाता है! एक पल में सब कुछ ठीक-ठाक, कसी हुई व्यवस्था हम आम नागरिकों के सामने दिखने लगती है। यही नहीं, प्रशासन की आम जनता से भी और ज्यादा सहयोगी होने की उम्मीद भी बलवती हो जाती है।

सरकार से अगर कोई उम्मीद करें, तो अब 'जांच' होगी। सभी राजनीतिक दलों के नेता एक-दूसरे को दोषी ठहराने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे। अपने 'कपड़े' और 'जूते' बचाते हुए विस्फोट प्रभावितों से मिलने जाने का दौर शुरू होगा। कुछ नेताओं ने अपने आकाओं की 'शह' पर यह अभियान शुरू भी कर दिया है। सत्तापक्ष सभी सुविधाएं मुहैया कराने का दावा करेगा तो विपक्ष प्रभावितों की ठीक से देखभाल न करने का आरोप लगाएगा। देश की जनता को यह पूरी 'प्रक्रिया' रट गई है, लेकिन हमारे नेताओं को 'अपडेट' होने में न जाने कितना वक्त लगेगा।

अब बात हमारी खुफिया एजेंसियों की 'सतर्कता' की। अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट बेंगलुरु बम धमाकों के अगले ही दिन हुए। बेंगलुरु धमाकों के बाद पूरे देश में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया था। फिर कैसे अहमदाबाद में एक-दो नहीं, 18 बम जगह-जगह रख दिए गए? उस समय क्या हमारी जांच एजेंसियां कान में तेल डालकर सो रही थीं। इतने सारे बम धमाकों के पीछे कोई एक-दो आदमी तो होंगे नहीं। फिर उनकी कारगुजारियों से ये एजेंसियां कैसे बेखबर रह गईं? 2002 के दंगों के बाद से ही गुजरात और नरेंद्र मोदी दोनों आतंकवादियों के निशाने पर हैं, इसके बावजूद खुफिया एजेंसियों की यह चूक कई बड़े सवाल खड़े करती है। देश में आतंकवादी खतरों से निपटने के लिए हमें सबसे पहले इन एजेंसियों को ही जवाबदेह बनाना पड़ेगा... और इसकी शुरुआत अब हो ही जानी चाहिए, क्योंकि देरी का मतलब है किसी और शहर में धमाकों की खबर सुनने को हम तैयार रहें...

बेंगलुरु, अहमदाबाद या सूरत ही नहीं, देश के हर शहर, हर जगह लगभग यही नजारा है। अभी दो दिन पहले, पड़ोस में एक कार के चोरी हो जाने के बाद रातोंरात कालोनी के बाहर गेट लग गया। रात को ऑफिस से घर लौटे तो पुलिस ने अपनी जीप पीछे लगा दी। घर के सामने गाड़ी से उतरते ही सवालों की झड़ी भी लगा दी। कहां से आ रहे हो? कौन हो? किसकी गाड़ी है? इतनी रात गए कौन सा ऑफिस खुलता है? पूरा परिचय और रात में घर से बाहर होने की वजह बता देने के बाद घर में घुस सका। कोई एतराज नहीं, इस पूछताछ से! लेकिन काश! यह चुस्ती-फुर्ती रोज हो तो कैसा रहे! फिर, न शायद बम फटेंगे, न मोहल्ले में चोरियां होंगी... और तब शायद पुलिस की पूछताछ भी प्यारी लगेगी।

बदले-बदले से 'सरकार' नजर आते हैं...

धर्मेंद्र कुमार
हाल ही में सुर्खियां बनीं इन तीन खबरों पर नजर डालिए। पहली- अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने पाया कि अफगानिस्तान की राजधानी काबुल स्थित भारतीय दूतावास पर हुए हमले में आईएसआई का हाथ है। बकौल उनके, इसके पुख्ता प्रमाण उनके पास मौजूद हैं। दूसरी-बुश का बयान... आखिर ये आईएसआई किसका हुक्म मानती है? तीसरी-सार्क सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री गिलानी ने भारतीय दूतावास पर हुए हमले में आईएसआई की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराने के लिए आश्वस्त किया।

इन खबरों को ध्यान से देखें तो, ये तीनों ही खबरें संभवत: अब तक के कूटनीतिक इतिहास में पहली बार एक साथ सुनने को मिली हैं। जरा गौर फरमाइए! अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को 'पहली बार' एहसास हुआ कि आतंकी हमलों में आईएसआई का 'हाथ' है। इसका 'सबूत' भी उन्हें मिल गया है। किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का 'परिचय' भी आईएसआई से हो गया। और, सबसे खास बात यह रही कि किसी पाकिस्तानी हुक्मरान ने आईएसआई की 'किसी' हरकत की स्वतंत्र जांच कराने की मंजूरी भी दे दी।

आखिर क्या राज है भारत के इस अचानक बढ़े 'प्रभाव' का? क्या वजह है कि यकायक भारत की आतंक के खिलाफ लड़ाई को लेकर अमेरिका भी चिंतित हो गया है? चलिए, अब इन खबरों के तारों को आपस में जोड़ते हैं। संभवत: क्या हुआ होगा, जो हमें ये खबरें नसीब हुईं। पिछले हफ्ते, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने सर्वसम्मति से सुरक्षा मानक समझौते को मंजूरी दे कर अंतरराष्ट्रीय परमाणु कारोबार में शिरकत की दिशा में भारत की राह की एक बड़ी बाधा दूर कर दी। अमेरिका से इसकी प्रतिक्रिया कुछ यूं मिली...भारत में अमेरिकी राजदूत डेविड सी मल्फोर्ड ने एक बयान में कहा, "हम परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत को विशेष छूट और अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी दिलाने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे।"

क्या यह नहीं लग रहा है कि अमेरिका के लिए भारत अचानक बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। इसका श्रेय हम अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को दें या परमाणु करार के लिए उनकी की गई 'अपार' मेहनत को। सब कुछ पैसे का खेल है! अरबों रुपये की डील के चलते अब अमेरिका को भारत की 'चिंता' करने का वक्त मिला है। इस चिंता के चलते 'पुराने दोस्त' पाकिस्तान को भी थोड़ा-बहुत कसा जा सकता है। संभवत: डील का यह एक 'पहला' फायदा हुआ है। लेकिन, क्या परमाणु करार इसकी कीमत है? अगर सही मायने में, यह कीमत है तो कहीं ये ज्यादा तो नहीं। कहीं वामदलों सहित विपक्ष की आशंकाएं सही साबित होने तो नहीं जा रही हैं? भविष्य में क्या हो सकता है? कितना समय लगेगा हमें एक और 'पुराना दोस्त' बनने में? कई सवाल उभरे हैं एक साथ। हमें समय रहते ध्यान देना जरूरी है।

अमेरिका के पुराने कूटनीतिक इतिहास को देखें, तो वहां चाहे डेमोक्रेटिक सत्ता में रहें या रिपब्लिक, विदेश नीति पर कोई खास अंतर नहीं पड़ता। निहित हितों के चलते कोई भी अमेरिका का शिकार बन सकता है। अब चाहे वह इराक हो, अफगानिस्तान हो या फिर कोई और। इसी क्रम में ईरान को भी देखा जा सकता है।

भारत के संदर्भ में देखें, तो पाकिस्तान, अमेरिका का बहुत पुराना दोस्त रहा है। अमेरिका-पाकिस्तान की यह 'बेमेल' दोस्ती दक्षिण एशिया में उसके हितों को देखते हुए बहुत महत्वपूर्ण है। आतंकी गतिविधियों पर नजर और नियंत्रण रखने की आड़ में जहां उसने इस क्षेत्र में अपने सैन्य आधार मजबूत किए हैं, वहीं दक्षिण एशियाई देशों पर कूटनीतिक दबाव बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। भौगोलिक दृष्टि के लिहाज से पहले पाकिस्तान और अब अफगानिस्तान भी, अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। शायद एक कारण यह भी है कि अमेरिका इस क्षेत्र से चाहते हुए भी सैन्य बलों में कटौती नहीं कर पा रहा है।

अभी, एक खबर के अनुसार परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह द्वारा बनाए गए ड्राफ्ट में भी भारत द्वारा भविष्य में किए जाने वाले परमाणु परीक्षणों पर चुप्पी साध ली गई है। यही नहीं, इस ड्राफ्ट के अनुसार भारत को परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत करने के लिए भी कहा जा सकता है। हालांकि, भारत ने अमेरिका को स्पष्ट तरीके से कह दिया है कि वह इसे स्वीकार नहीं करेगा। कुछ ऐसी ही 'उम्मीदें' परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के दूसरे देशों की भी हैं। और, अमेरिका ने भारत को इस बारे में आगाह भी किया है कि वह सदस्य देशों की उन 'उम्मीदों' को भी ड्राफ्ट में शामिल कर सकता है। हालांकि ये भरोसा भी दिलाने की कोशिश की है कि ये सब 'उम्मीदें' हैं, न कि 'शर्तें'... लेकिन, भारत को आसन्न परेशानियों को देखते हुए बिना हड़बड़ी के फूंक-फूंक कर कदम उठाने की जरूरत है। अन्यथा आगे चलकर हम अनचाही मुसीबतों के जाल में फंसते चले जाएंगे।

नेपाल छिटक गया, कोसी भटक गई

धर्मेंद्र कुमार
बिहार अब तक की सबसे बड़ी आपदा का सामना कर रहा है। छोटे-छोटे बच्चों को कंधों पर लिए गर्दन तक भरे पानी से होकर गुजरते लोगों की तस्वीरें टीवी पर लगातार दिखाई जा रही हैं। वेबसाइटों और अखबारों के पन्ने बाढ़ की कहानियों से भरे पड़े हैं। देशभर से कई समाजसेवी संगठन और लोग मदद के लिए आगे आ रहे हैं। राहत सामग्री भेजी जा रही है। कुल मिलाकर जिंदगी बचाने के लिए जद्दोजहद जारी है। और हां... जीत हमेशा की तरह मानव की ही होने वाली है। लेकिन, कुछ सवाल उभर रहे हैं...

क्या बचा जा सकता था इस आपदा से? शायद हां। कहने को तो हम दोषी ठहरा सकते हैं कमजोर आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को...लेकिन, इस त्रासदी के लिए पड़ोसी देशों के साथ हमारी विदेश नीति भी कम जिम्मेदार नहीं है।

कभी 'छोटे भाई' का दर्जा पाए और हाल ही में कुछ 'गैर-जिम्मेदाराना' व्यवहार का प्रदर्शन करता हुआ नेपाल भी आपदा की इस घड़ी में दूर खड़ा ताली बजाता-सा दिख रहा है। उस पर नेपाली सरकार का यह बयान कि बाढ़ को रोक सकने में सक्षम बांध की मरम्मत का सारा दारोमदार तो भारत पर है, नेपाल क्या कर सकता है।

अगर हम अपने गिरेबां में झांकें तो संभवत: इस त्रासदी के बीज शायद सात साल पहले नेपाल के राजमहल में हुए नरसंहार के दौरान ही बोए जा चुके थे। बात है तो बड़ी अजीब सी...लेकिन कहीं न कहीं सच भी लगती है।

चलिए... केवल सात साल पुराने इतिहास के आइने में झांक कर देखने का प्रयास करते हैं। राजमहल में राजा बीरेंद्र विक्रम शाह और उनके परिवार की 'रहस्यमयी' मौत के बाद की नेपाली राजनीति पर एक नजर डालते हैं। राजा बीरेंद्र विक्रम शाह और युवराज दीपेंद्र की मौत के बाद ज्ञानेंद्र राजा बने और उनके साहबजादे पारस युवराज बने। ऐसा लगने लगा कि नेपाल में एक राजा गया और दूसरे ने शासन की बागडोर संभाल ली है। भारतीय विदेश नीति के तत्कालीन कर्ता-धर्ताओं ने बदलती दुनिया पर गौर न करते हुए राजा ज्ञानेंद्र को आधिकारिक मान्यता दे दी। पूरी दुनिया में लोकतंत्र की पैरवी करने वाले भारत ने एक राजा या यह कहें कि एक नए 'तानाशाह' को बिना शर्त समर्थन दे डाला।

उस वक्त बजाय इसके नेपाल में लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुष्ट होने में मदद दी जा सकती थी। भारत अपने प्रभाव का उपयोग वहां इस काम में कर सकता था। इससे कमजोर होते नेपाली राजनीतिक दलों को भारत के रूप में एक पालनहार नजर आता। लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा। समय प्रवाह के चलते राजा ज्ञानेंद्र और नेपाली राजनीतिक दलों का ढांचा और कमजोर होता चला गया। और, मौका मिला लगातार संघर्ष कर रहे माओवादियों को। कमजोर राजनीतिक दलों के खिलाफ लगातार मजबूत हो रहे माओवादी राजा ज्ञानेंद्र को बेदखल करते हुए सत्ता में लौटे। हुआ वही जिसकी माओवादियों से आशंका थी। प्रधानमंत्री प्रचंड ने पद संभालते ही भारत के बजाय पहले चीन की यात्रा करने की घोषणा की। और चीन हो भी आए। हालांकि, उनका भारत दौरा भी प्रस्तावित है।

बिहार में आई बाढ़ के समय को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। अपने यहां बदतर होती स्थिति का हवाला देते हुए नेपाल लगातार इस क्षेत्र में पानी छोड़ रहा है। पहले ऐसी नौबत कभी नहीं आई। अभी भारत सरकार को बाढ़ की आपदा से लोगों को बचाने का ही काम नहीं, बल्कि और भी कई आफतों से दो-चार होना है। बाढ़ के बाद बीमारियां फैलने की पूरी आशंका है। करीब 75 फीसदी लोग बाढ़ग्रस्त क्षेत्र से बाहर निकल चुके हैं। बाकी के लोग जानमाल की हिफाजत के लिए वहीं डटे हुए हैं। लेकिन, जब बीमारियां फैलेंगी तो कितने और लोगों को वहां से विस्थापित होना पड़ेगा, कहना मुश्किल है।

जानकारों के अनुसार बाढ़ग्रस्त क्षेत्र को लेकर सबसे बड़ी आशंका इसके भौगोलिक महत्व को लेकर है। 16 जिले यानी क्षेत्रफल के हिसाब से करीब आधे बिहार का यह क्षेत्र भारत के साथ खुली सीमाओं वाले पड़ोसी देश नेपाल के अलावा बांग्लादेश को भी छूता है। घुसपैठ करने वाले तत्वों के लिए यह क्षेत्र अब लगभग 'खुला दरबार' हो सकता है। माओवादियों और नक्सलियों के लिए अपनी गतिविधियों को चलाने के लिए आवश्यक भूमि की पूर्ति यहां से हो सकती है। यहां यह कहने की भी जरूरत नहीं है कि इस काम में उनकी मदद और कौन से पड़ोसी देश कर सकते हैं। यह माना जा सकता है कि 'छोटा भाई' अपने शब्दों में अब बराबरी का दर्जा चाहता है। और, इसके लिए उसे अपने 'बड़े भाई' की गोद से छिटकने से भी गुरेज नहीं है।
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