धर्मेंद्र कुमार
दुबई की बिन खादिम कंपनी के तेल वाहक जहाज अल वतूल पर तैनात कराए गए नौ भारतीय युवकों का अभी तक कोई अता-पता नहीं है। थक हारकर परिजनों ने अहमदाबाद हाईकोर्ट की शरण ली है। परिजनों का कहना है कि सरकार और आरोपी सी-हॉर्स अकादमी इस मामले में ढिलाई बरत रहे हैं।
लापता नाविकों में से एक भूपेंद्र सिंह के पिता राजेंद्र सिंह चौधरी द्वारा गत 24 मार्च को सी-हॉर्स अकादमी ऑफ मर्चेंट नेवी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के बाद अदालत ने 29 जून को मामले की सुनवाई की।
मामला कुछ इस तरह है कि वलसाड के भूपेंद्र सिंह, जयपुर के विकास चौधरी, भूमराम रूंदला और रतिराम जाट (दोनों भाई), रांची के अमित कुमार, लुधियाना के जितेंद्र सिंह, भिवानी के विक्रम सिंह, रेवाड़ी के नरेंद्र कुमार, महाराष्ट्र के प्रकाश जाधव तथा अलीगढ़ के श्रवण सिंह ने हैदराबाद स्थित इस मर्चेंट नेवी प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश लिया था। कोर्स के दौरान ही ऑन बोर्ड ट्रेनिंग और नौकरी का वादा किए जाने के चलते इन छात्रों को एजेंटों के जरिए दुबई की बिन खादिम कंपनी के तेल वाहक जहाज अल वतूल पर तैनाती करा दी गई। युवकों ने अपने परिजनों को बताया था कि वे शारजाह से ईरान तेल के आयात-निर्यात करने वाले जहाज पर तैनात हैं। पिछले साल माह फरवरी के अंतिम सप्ताह में ये लोग शारजाह के लिए रवाना हुए और अप्रैल तक ये लोग अपने परिजनों से संपर्क करते रहे। बाद में पता लगा कि अल वतूल जहाज को ईरानी कोस्टल गार्ड ने अपने कब्जे में ले लिया है। ज्यादा छानबीन की गई तो पता चला कि जहाज रास्ता भटककर ईरानी सीमा में चला गया और जहाज पर तैनात सभी कर्मियों को तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है।
15 मई, 2010 को इनमें से एक युवक श्रवण सिंह की मौत हो गई।
लापता नाविकों के परिजनों ने बंदर अब्बास स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास से संपर्क किया। लेकिन आश्वासनों के अलावा कोई खास मदद नहीं मिली।
इस संबंध में सभी लापता नाविकों के परिजन अभी तक राष्ट्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटिल और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मदद की गुहार लगा चुके हैं।
पिछले दिनों जंतर-मंतर पर अनशन भी किया जा चुका है। लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं मिली है।
Sunday, July 10, 2011
Monday, May 30, 2011
अब नहीं दिखते ठंडाई के ठेले
धर्मेंद्र कुमार
फास्ट फूड एवं इंस्टैंट पेयों के तेजी से चल निकले चलन से परंपरागत पेयों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। इन पेयों में कई तरह के शरबत एवं ठंडाइयां आदि शामिल हैं... तो चर्चा करते हैं ठंडाई की... जिसके ठेले अब दिखाई नहीं देते हैं।
अगर परिभाषा की बात की जाए तो मानक हिंदी कोष व हिंदी शब्द सागर के अनुसार ठंडाई वह दवा या मसाला है जिससे शरीर व मस्तिष्क को शीतलता महसूस होती है। यह प्राय: गर्मी के दिनों में घोटकर अवं घोलकर शरबत के रूप में बनाई और पी जाती है।
ठंडाई दूध, बादाम, पिश्ते, काली मिर्च, सौंफ, इलायची, गुलाब की पंखुड़ियां, मुनक्का, खसखस एवं ककड़ी, खरबूज और तरबूज के बीजों का मिश्रण होती है। मिठास लाने के लिए इसमें एक तरह की कच्ची खांड़ 'तगार' मिलाई जाती है।
आयुर्वेद संहिता में इसे दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें मौजूद ब्राह्मी, कासनी एवं मुलैठी आदि जड़ी-बूटियां मस्तिष्क एवं गले को शीतलता प्रदान करती हैं। ठंडाई में प्रयुक्त बादाम और पिश्ते जहां मेधाशक्ति एवं प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं वहीं हृदय के लिए भी यह गुणकारी होते हैं। काली मिर्च, मुनक्का, गुलाब और इलायची गले एवं आतों को साफ करती है और कफ को नियंत्रित रखती है। इसके अलावा गुलाब की पंखुड़ियां व काली मिर्च आंखों की आवर्धन क्षमता को बढ़ाती हैं। मुलैठी व ब्राह्मी मस्तिष्क के लिए अत्यंत लाभकारी होती हैं। सौंफ एवं खरबूज, तरबूज व ककड़ी के बीज गुर्दे व मूत्राशय के रोगों में अत्यंत लाभ पहुंचाते हैं। पुराने समय में और कहीं-कहीं अब भी ठंडाई का प्रयोग अखाड़ों में पहलवानों द्वारा कसरत करने के बाद शीतलता प्रदान करने के लिए किया जाता रहा है। आजकल ठंडाई का स्थान कई तरह के कोला पेयों ने ले लिया है। इनका प्रयोग करना युवाओं के लिए स्टेटस सिंबल सा बन गया है। इन प्रचलित पेयों में मौजूद कई प्रकार के कारक हमें अवर्णनीय नुकसान पहुंचाते हैं। ये पेय हमें तत्कालीन उत्तेजना तो प्रदान करते हैं लेकिन यह उत्तेजना क्षणिक होती है जबकि इनके नुकसान या दुष्प्रभाव दीर्घकालिक होते हैं।
ठंडाई के सेवन से उनमें उपस्थित संघटकों के कारण तन व मन को अपार शीतलता एवं स्फूर्ति और शक्ति मिलती है तथा भीषण गर्मी और धूप से पैदा होने वाले दुष्प्रभाव दूर होते हैं। पौराणिक उल्लेखों के इनुसार समुद्र मंथन के समय जो 14 रत्न विभूतियां निकलीं उनमें हलाहल विष और वैद्य धन्वंतरि भी थे। विश्व को हलाहल विष की ज्वालाओं से खाक होने से बचाने के लिए शिव ने हलाहल पान कर कंठ में धारण कर लिया ताकि हृदय में स्थित अपने आराध्य हरि (श्री विष्णु) को विष दग्ध न करे। अब हलाहल शिव के कंठ में होने से चिंतित देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों और धन्वंतरि ने विचार-विमर्श कर उन्हें धतूरा सेवन कराकर चिकित्सा के इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि विष ही विष को काटता है। साथ ही भांग मिश्रित ठंडाई निरंतर सेवन कराई। शिव भक्ति में शिव को ठंडाई अर्पित करना पुण्य कारक माना जाता है। शरीरस्थ विषों को शांत करने में ठंडाई सहायक होती है, ऐसा आयुर्वेद विशारद कहते हैं।
आजकल बाजार में कई तरह की डिब्बाबंद ठंडाइयां उपलब्ध हैं लेकिन ये ब्रांड इंस्टैंट पेयों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं। इन ब्रांडों में मिश्रांबु, वैद्यनाथ एवं हल्दीराम आदि कंपनियां शामिल हैं।
शुरुआती समय के कई प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान अब मात्र एक तख्त तक सिमटकर किसी भी तरह इस परंपरा को बचाने के लिए संघर्षरत हैं क्योंकि मौजूदा पीढ़ी कोला पेय और चाय, कॉफी की दीवानी है। ठंडाई उन्हें बीते वक्त की चीज लगती है।
अस्सी वर्षीय अजुद्दी चौधरी ठंडाई बनाने का काम करीब 11 साल पहले छोड़ चुके हैं। वह अब मात्र शादी-विवाहों के अवसरों पर ही अपने हुनर का इस्तेमाल कर किसी प्रकार जीविका चला रहे हैं। जब उनसे ठंडाई की घटती लोकप्रियता के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसके लिए पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण ज्यादा जिम्मेदार है। चैनल संस्कृति में ठंडाई जैसी परंपराएं जीवित रखना बहुत ही दुष्कर कार्य है। आजकल हरेक व्यक्ति तुरत-फुरत अपनी प्यास बुझाना चाहता है और इसके लिए विभिन्न कोला और कोल्ड ड्रिंक्स बाजार में उपलब्ध हैं।
दूसरी ओर, उन्होंने इसके लिए ठंडाई बनाने में किए जाने वाले समझौतों को भी दोषी ठहराया। उन्होंने बताया कि ठंडाई में बादाम के बजाय पेठे के बीज पीसकर डाले जाते हैं। मीठा करने के लिए पहले जो तगार मिलाया जाता था उसके स्थान पर अब चीनी मिला दी जाती है। चीनी से इसमें वह प्रभाव और स्वाद नहीं आ पाता है जिसके लिए यह जानी जाती है। अजुद्दी चौधरी की आगे की पीढ़ियों को इस व्यवसाय में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पुत्र का तंबाकू का व्यवसाय है।
यद्यपि फास्ट फूड और कोला के इस दौर में शहरों में लोग ठंडाई सेवन को लोग भूलते जा रहे हैं लेकिन गांव, कस्बों एवं छोटे शहरों के परंपरागत इलाकों में अपने अद्भुत स्वाद एवं सीरत तथा औषधीय गुणों के कारण प्राचीन भारतीय पेय ठंडाई को भुलाना असंभव होगा क्योंकि जो एक बार इसे पी लेता है वह इसका मुरीद हो जाता है। होली तो ठंडाई के बिना मन ही नहीं सकती।
किस्से-कहानियों, फिल्मों और फिल्मी गानों में भी ठंडाई के गुण गाए जाते हैं। काव्य में तो ठंडाई के विशद विवरण मिलते हैं। यही कारण है कि कोला और कॉफी के दौर में भी ठंडाई अपना अनोखा स्वाद लिए किसी भी तरह डटी हुई है।
फास्ट फूड एवं इंस्टैंट पेयों के तेजी से चल निकले चलन से परंपरागत पेयों पर अस्तित्व का संकट मंडरा रहा है। इन पेयों में कई तरह के शरबत एवं ठंडाइयां आदि शामिल हैं... तो चर्चा करते हैं ठंडाई की... जिसके ठेले अब दिखाई नहीं देते हैं।
अगर परिभाषा की बात की जाए तो मानक हिंदी कोष व हिंदी शब्द सागर के अनुसार ठंडाई वह दवा या मसाला है जिससे शरीर व मस्तिष्क को शीतलता महसूस होती है। यह प्राय: गर्मी के दिनों में घोटकर अवं घोलकर शरबत के रूप में बनाई और पी जाती है।
ठंडाई दूध, बादाम, पिश्ते, काली मिर्च, सौंफ, इलायची, गुलाब की पंखुड़ियां, मुनक्का, खसखस एवं ककड़ी, खरबूज और तरबूज के बीजों का मिश्रण होती है। मिठास लाने के लिए इसमें एक तरह की कच्ची खांड़ 'तगार' मिलाई जाती है।
आयुर्वेद संहिता में इसे दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें मौजूद ब्राह्मी, कासनी एवं मुलैठी आदि जड़ी-बूटियां मस्तिष्क एवं गले को शीतलता प्रदान करती हैं। ठंडाई में प्रयुक्त बादाम और पिश्ते जहां मेधाशक्ति एवं प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं वहीं हृदय के लिए भी यह गुणकारी होते हैं। काली मिर्च, मुनक्का, गुलाब और इलायची गले एवं आतों को साफ करती है और कफ को नियंत्रित रखती है। इसके अलावा गुलाब की पंखुड़ियां व काली मिर्च आंखों की आवर्धन क्षमता को बढ़ाती हैं। मुलैठी व ब्राह्मी मस्तिष्क के लिए अत्यंत लाभकारी होती हैं। सौंफ एवं खरबूज, तरबूज व ककड़ी के बीज गुर्दे व मूत्राशय के रोगों में अत्यंत लाभ पहुंचाते हैं। पुराने समय में और कहीं-कहीं अब भी ठंडाई का प्रयोग अखाड़ों में पहलवानों द्वारा कसरत करने के बाद शीतलता प्रदान करने के लिए किया जाता रहा है। आजकल ठंडाई का स्थान कई तरह के कोला पेयों ने ले लिया है। इनका प्रयोग करना युवाओं के लिए स्टेटस सिंबल सा बन गया है। इन प्रचलित पेयों में मौजूद कई प्रकार के कारक हमें अवर्णनीय नुकसान पहुंचाते हैं। ये पेय हमें तत्कालीन उत्तेजना तो प्रदान करते हैं लेकिन यह उत्तेजना क्षणिक होती है जबकि इनके नुकसान या दुष्प्रभाव दीर्घकालिक होते हैं।
ठंडाई के सेवन से उनमें उपस्थित संघटकों के कारण तन व मन को अपार शीतलता एवं स्फूर्ति और शक्ति मिलती है तथा भीषण गर्मी और धूप से पैदा होने वाले दुष्प्रभाव दूर होते हैं। पौराणिक उल्लेखों के इनुसार समुद्र मंथन के समय जो 14 रत्न विभूतियां निकलीं उनमें हलाहल विष और वैद्य धन्वंतरि भी थे। विश्व को हलाहल विष की ज्वालाओं से खाक होने से बचाने के लिए शिव ने हलाहल पान कर कंठ में धारण कर लिया ताकि हृदय में स्थित अपने आराध्य हरि (श्री विष्णु) को विष दग्ध न करे। अब हलाहल शिव के कंठ में होने से चिंतित देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों और धन्वंतरि ने विचार-विमर्श कर उन्हें धतूरा सेवन कराकर चिकित्सा के इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया कि विष ही विष को काटता है। साथ ही भांग मिश्रित ठंडाई निरंतर सेवन कराई। शिव भक्ति में शिव को ठंडाई अर्पित करना पुण्य कारक माना जाता है। शरीरस्थ विषों को शांत करने में ठंडाई सहायक होती है, ऐसा आयुर्वेद विशारद कहते हैं।
आजकल बाजार में कई तरह की डिब्बाबंद ठंडाइयां उपलब्ध हैं लेकिन ये ब्रांड इंस्टैंट पेयों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं। इन ब्रांडों में मिश्रांबु, वैद्यनाथ एवं हल्दीराम आदि कंपनियां शामिल हैं।
शुरुआती समय के कई प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान अब मात्र एक तख्त तक सिमटकर किसी भी तरह इस परंपरा को बचाने के लिए संघर्षरत हैं क्योंकि मौजूदा पीढ़ी कोला पेय और चाय, कॉफी की दीवानी है। ठंडाई उन्हें बीते वक्त की चीज लगती है।
अस्सी वर्षीय अजुद्दी चौधरी ठंडाई बनाने का काम करीब 11 साल पहले छोड़ चुके हैं। वह अब मात्र शादी-विवाहों के अवसरों पर ही अपने हुनर का इस्तेमाल कर किसी प्रकार जीविका चला रहे हैं। जब उनसे ठंडाई की घटती लोकप्रियता के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसके लिए पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण ज्यादा जिम्मेदार है। चैनल संस्कृति में ठंडाई जैसी परंपराएं जीवित रखना बहुत ही दुष्कर कार्य है। आजकल हरेक व्यक्ति तुरत-फुरत अपनी प्यास बुझाना चाहता है और इसके लिए विभिन्न कोला और कोल्ड ड्रिंक्स बाजार में उपलब्ध हैं।
दूसरी ओर, उन्होंने इसके लिए ठंडाई बनाने में किए जाने वाले समझौतों को भी दोषी ठहराया। उन्होंने बताया कि ठंडाई में बादाम के बजाय पेठे के बीज पीसकर डाले जाते हैं। मीठा करने के लिए पहले जो तगार मिलाया जाता था उसके स्थान पर अब चीनी मिला दी जाती है। चीनी से इसमें वह प्रभाव और स्वाद नहीं आ पाता है जिसके लिए यह जानी जाती है। अजुद्दी चौधरी की आगे की पीढ़ियों को इस व्यवसाय में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके पुत्र का तंबाकू का व्यवसाय है।
यद्यपि फास्ट फूड और कोला के इस दौर में शहरों में लोग ठंडाई सेवन को लोग भूलते जा रहे हैं लेकिन गांव, कस्बों एवं छोटे शहरों के परंपरागत इलाकों में अपने अद्भुत स्वाद एवं सीरत तथा औषधीय गुणों के कारण प्राचीन भारतीय पेय ठंडाई को भुलाना असंभव होगा क्योंकि जो एक बार इसे पी लेता है वह इसका मुरीद हो जाता है। होली तो ठंडाई के बिना मन ही नहीं सकती।
किस्से-कहानियों, फिल्मों और फिल्मी गानों में भी ठंडाई के गुण गाए जाते हैं। काव्य में तो ठंडाई के विशद विवरण मिलते हैं। यही कारण है कि कोला और कॉफी के दौर में भी ठंडाई अपना अनोखा स्वाद लिए किसी भी तरह डटी हुई है।
Friday, May 27, 2011
और धूं-धूंकर जल उठा विमान आसमान में....
धर्मेंद्र कुमार
फरीदाबाद (भारत): फरीदाबाद में एक छोटा चार्टर्ड प्लेन हादसे का शिकार हो गया। इस हादसे में 10 लोग मारे गए और 3 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। ‘पीसी 12 हार्टजेल’ विमान वास्तव में एम्बुलेन्स फ्लाइट थी, जिसमें एक मरीज सहित सात लोग थे।
विमान में एक मरीज राहुल राज (20 वर्ष), दो पायलट- कैप्टन हरप्रीत और कैप्टन मंजीत कटारिया, दो डॉक्टर- डॉ. अरशद एवं डॉ. राजेश, सिरील नामक एक पुरुष नर्स और मरीज का एक परिजन रत्नेश कुमार सवार थे। पटना के जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निदेशक अरविंद दुबे ने बताया कि विमान ने वहां से साढ़े सात बजे उड़ान भरी।
यह चार्टर्ड विमान मरीज राहुल राज को लेकर दिल्ली आ रहा था। विमान करीब 10 बजकर 35 मिनट पर वायुसेना स्टेशन के समीप पर्वतीय कॉलोनी में एक मकान पर गिरकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
राहुल के पिता और चाचा राहुल के पहुंचने से पहले खुद दिल्ली पहुंच गए, ताकि यहां सारा इंतजाम पहले से हो जाए। अस्पताल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद वे राहुल के आने का इंतजार करने लगे। समय काटने के लिए वे लोग टीवी देख रहे थे, तभी उन्हें इस दर्दनाक हादसे की खबर मिली। इस हादसे की खबर जैसे ही बेतिया में राहुल के घर पहुंची, वहां मातम छा गया।
इस प्लेन क्रैश में तीन लोग घायल हुए हैं, जिन्हें फरीदाबाद के बीके अस्पताल में भर्ती कराया गया है। ये वे लोग हैं, जो हादसे के बाद लोगों को बचाने के लिए मौके पर पहुंचे थे, लेकिन राहत और बचाव का काम करते हुए जख्मी हो गए।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि रात करीब साढ़े 10 बजे एकाएक धूल भरी आंधी आई। उसी दौरान आसमान में धू-धू की आवाज को सुनकर लोग घबरा गए, लेकिन बादलों के कारण लोगों को विमान साफ-साफ नजर नहीं आया। इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते, विमान पर्वतीय कालोनी के एक मकान पर जा गिरा।
पटना स्थित जगदीश मेमोरियल अस्पताल के डॉ. आलोक कुमार ने बताया कि 20 वर्षीय राहुल जिगर की बीमारी से पीड़ित था और 22 मई को इस अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया था। उसकी हालत बिगड़ने पर उसके चचेरे भाई रत्नेश कुमार ने दिल्ली स्थित अपोलो अस्पताल से संपर्क किया और वहां के दो डॉक्टरों के साथ उसने एंबुलेन्स फ्लाइट बुलवाई थी। इसी फ्लाइट से राहुल को दिल्ली स्थित अपोलो अस्पताल लाया जा रहा था। बताया जाता है कि बेतिया के रहने वाले राजेश कुमार का बेटा राहुल कोमा में था।
विमान गिरने के बाद घर में आग लग गई थी। दमकल विभाग की गाड़ियों ने आग पर काबू पा लिया। जवाहर कालोनी स्थित अपने घर की छत से विमान को गिरते देख रही प्रत्यक्षदर्शी ऋचा गुप्ता के अनुसार आग की लपटें दूर-दूर तक देखी गईं। कुछ अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विमान में आग हवा में ही लग गई थी। लोगों ने जलता हुआ विमान गिरते देखा।
फरीदाबाद (भारत): फरीदाबाद में एक छोटा चार्टर्ड प्लेन हादसे का शिकार हो गया। इस हादसे में 10 लोग मारे गए और 3 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। ‘पीसी 12 हार्टजेल’ विमान वास्तव में एम्बुलेन्स फ्लाइट थी, जिसमें एक मरीज सहित सात लोग थे।
विमान में एक मरीज राहुल राज (20 वर्ष), दो पायलट- कैप्टन हरप्रीत और कैप्टन मंजीत कटारिया, दो डॉक्टर- डॉ. अरशद एवं डॉ. राजेश, सिरील नामक एक पुरुष नर्स और मरीज का एक परिजन रत्नेश कुमार सवार थे। पटना के जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निदेशक अरविंद दुबे ने बताया कि विमान ने वहां से साढ़े सात बजे उड़ान भरी।
यह चार्टर्ड विमान मरीज राहुल राज को लेकर दिल्ली आ रहा था। विमान करीब 10 बजकर 35 मिनट पर वायुसेना स्टेशन के समीप पर्वतीय कॉलोनी में एक मकान पर गिरकर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
राहुल के पिता और चाचा राहुल के पहुंचने से पहले खुद दिल्ली पहुंच गए, ताकि यहां सारा इंतजाम पहले से हो जाए। अस्पताल की सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद वे राहुल के आने का इंतजार करने लगे। समय काटने के लिए वे लोग टीवी देख रहे थे, तभी उन्हें इस दर्दनाक हादसे की खबर मिली। इस हादसे की खबर जैसे ही बेतिया में राहुल के घर पहुंची, वहां मातम छा गया।
इस प्लेन क्रैश में तीन लोग घायल हुए हैं, जिन्हें फरीदाबाद के बीके अस्पताल में भर्ती कराया गया है। ये वे लोग हैं, जो हादसे के बाद लोगों को बचाने के लिए मौके पर पहुंचे थे, लेकिन राहत और बचाव का काम करते हुए जख्मी हो गए।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि रात करीब साढ़े 10 बजे एकाएक धूल भरी आंधी आई। उसी दौरान आसमान में धू-धू की आवाज को सुनकर लोग घबरा गए, लेकिन बादलों के कारण लोगों को विमान साफ-साफ नजर नहीं आया। इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते, विमान पर्वतीय कालोनी के एक मकान पर जा गिरा।
पटना स्थित जगदीश मेमोरियल अस्पताल के डॉ. आलोक कुमार ने बताया कि 20 वर्षीय राहुल जिगर की बीमारी से पीड़ित था और 22 मई को इस अस्पताल में उसे भर्ती कराया गया था। उसकी हालत बिगड़ने पर उसके चचेरे भाई रत्नेश कुमार ने दिल्ली स्थित अपोलो अस्पताल से संपर्क किया और वहां के दो डॉक्टरों के साथ उसने एंबुलेन्स फ्लाइट बुलवाई थी। इसी फ्लाइट से राहुल को दिल्ली स्थित अपोलो अस्पताल लाया जा रहा था। बताया जाता है कि बेतिया के रहने वाले राजेश कुमार का बेटा राहुल कोमा में था।
विमान गिरने के बाद घर में आग लग गई थी। दमकल विभाग की गाड़ियों ने आग पर काबू पा लिया। जवाहर कालोनी स्थित अपने घर की छत से विमान को गिरते देख रही प्रत्यक्षदर्शी ऋचा गुप्ता के अनुसार आग की लपटें दूर-दूर तक देखी गईं। कुछ अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विमान में आग हवा में ही लग गई थी। लोगों ने जलता हुआ विमान गिरते देखा।
(कुछ अंश और फोटो भाषा से, वीडियो एनडीटीवीखबर.कॉम से)
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