Tuesday, September 04, 2012

लड़ते रहें तो बड़ी मुश्किलें हो जाती हैं छोटी...

एक समय बड़े किसान रहे पिता की असमय मौत के बाद पैदा हुए अभावों के चलते 10-11 साल का एक किशोर अपने अहाते में उगाई गई सब्जियां लेकर बेचने निकल पड़ता है। मोहल्ले में रहने वाले पिता के दोस्त ने तरस खाकर अपने ऑफिस में 'बड़े साहब' के केबिन के सामने बैठने वाले चपरासी की नौकरी दिलवा दी। वक्त बीता... उस किशोर ने अपनी पढ़ाई-लिखाई किसी न किसी तरह जारी रखी और एक दिन उसी ऑफिस में 'बड़े साहब' की कुर्सी हासिल की।

इतना ही नहीं, अपनी पांच में से चार बहनों की देखभाल और फिर उनकी शादियां कीं... आज सभी बहनें संपन्न घरों में खुशहाल जिंदगी जी रही हैं। सब कुछ फिल्मी सा लगता है लेकिन सच है। मामा जी आज नहीं रहे। जीवन की एक बेहतरीन लेकिन अधूरी पारी खेलते हुए सवेरे-सवेरे नींद मेरे मामाजी मंगलसैन गुप्ता की मृत्यु की खबर से खुली।

मामाजी! आप से हमने यह सीखा है कि मुश्किलें कितनी भी बड़ी क्यों न हों, लगातार लड़ते जाने से उन्हें बहुत छोटी होते देखा जा सकता है। आपके साथ बिताए पल याद आएंगे, आपसे की गई जिदें याद आएंगी, आपकी बहुत याद आएगी और हर बार साथ में मुश्किलों से लड़ने की नई ताकत भी आएगी...
धर्मेंद्र कुमार

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