Friday, December 31, 2010

नए साल की ढेरों शुभकामनाएं...

मीडियाभारती वेब सॉल्युशन्स की ओर से नए साल की ढेरों शुभकामनाएं... आपके उपयोग के लिए साल के पहले महीने के कैलेंडर... सिर्फ आपके लिए... :)
--धर्मेंद्र कुमार

Tuesday, December 28, 2010

वे लौट के फिर ना आए...

धर्मेंद्र कुमार
आंखों में सपने लिए, घर से वे चल तो दिए लेकिन राहें उन्हें न जाने कहां ले गईं। घर-परिवार के लोग ढूंढ़ते रहे और बीते आठ महीनों से तो कोई संदेशा भी नहीं आया। आई तो उनमें से एक की लाश, एक बैरंग लिफाफे की तरह। लाश... लेने के लिए भी नियोक्ता कंपनी ने मांगे तीन लाख रुपये, पैसे थे नहीं... आखिर, लाश तो मिल गई लेकिन लग गए और दो महीने। अब अंतिम संस्कार करके घर में मां-बाप और बहन-भाई बैठे हैं, रो रहे हैं कि आखिर किस बुरी घड़ी में उन्होंने अपने जिगर के टुकड़े को शारजाह जाने की अनुमति दे दी।

ये कहानी उनमें से एक की है। बाकी और नौ घरों के चिराग हैं जिनके बारे में अभी कोई खबर नहीं है।

वलसाड के भूपेंद्र सिंह, जयपुर के विकास चौधरी, भूमराम रूंदला और रतिराम जाट (दोनों भाई), रांची के अमित कुमार, लुधियाना के जितेंद्र सिंह, भिवानी के विक्रम सिंह, रेवाड़ी के नरेंद्र कुमार, महाराष्ट्र के प्रकाश जाधव तथा अलीगढ़ के सरवन सिंह ने हैदराबाद के एक मर्चेंट नेवी प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश लिया। कोर्स के दौरान ही ऑन बोर्ड ट्रेनिंग और नौकरी का वादा किए जाने के चलते इन छात्रों को एजेंटों के जरिए दुबई की बिन खादिम कंपनी के तेल वाहक जहाज अल वतूल पर तैनाती करा दी गई। युवकों ने अपने परिजनों को बताया था कि वे शारजाह से ईरान तेल के आयात-निर्यात करने वाले जहाज पर तैनात हैं।

माह फरवरी के अंतिम सप्ताह में ये लोग शारजाह के लिए रवाना हुए। अप्रैल तक ये लोग अपने परिजनों से संपर्क करते रहे। लेकिन यकायक यह सिलसिला बंद हो गया। घर के लोगों की चिंताएं बढ़ीं तो उन्होंने खोजबीन शुरू की। सबसे पहले उन एजेंटों से बात की गई जिनके जरिए इन युवकों की तैनाती कराई गई थी। कुछ दिन तक ये एजेंट उन्हें आश्वासन देते रहे लेकिन बाद में फोन उठाना बंद कर दिया। इस दौरान इतना जरूर पता लगा कि अल वतूल जहाज को ईरानी कोस्टल गार्ड ने अपने कब्जे में ले लिया है।

ज्यादा छानबीन की गई तो पता चला कि जहाज रास्ता भटककर ईरानी सीमा में चला गया और जहाज पर तैनात सभी कर्मियों को तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है।

कोई चारा न देख परिजनों ने बंदर अब्बास स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास से संपर्क किया। बार-बार फोन करने पर कार्रवाई का ‘आश्वासन’ मिला। लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ। युवकों में से एक भूपेंद्र सिंह के पिता राजेंद्र सिंह चौधरी और रूंदला बंधुओं के रिश्तेदारों ने भारत में ईरानी दूतावास और विदेश मंत्रालय से भी जानने की कोशिश की लेकिन नतीजा... वही ढाक के तीन पात।

15 मई को एक युवक सरवन सिंह की मौत हो गई तो परिजनों को कंपनी की ओर से इसकी खबर मिली और शव भेजने के लिए तीन लाख रुपये खर्चे के रूप में जमा करने की बात कही गई। सेवानिवृत फौजी पिता ने पैसे देने में असमर्थता जताई तो 18 अगस्त को उसके शव को दिल्ली भेज दिया गया। जहां उसके परिजनों ने इसे प्राप्त कर लिया। इस मामले में जब ईरानी दूतावास से पता किया गया तो बताया गया कि सरवन की मौत हृदय गति रुक जाने से हुई। जबकि एजेंटों से मिली जानकारी के अनुसार इन युवकों को ईरानी कोस्ट गार्ड ने हिरासत में लिया था। ईरान में भारतीय दूतावास से संपर्क करने पर बताया गया कि जहाज पर समुद्री लुटेरों का हमला हुआ था जिसमें सरवन की मौत हुई। बहरहाल, सरवन के जिस्म पर चोट का कोई निशान न था।

सरवन के पिता भूरे सिंह की अपने बेटे से आखिरी बात 28 अप्रैल को हुई थी जिसमें उसने घर के लिए 40 हजार रुपये भेजने की बात कही थी।

इस घटना से अन्य युवकों के परिजनों की चिंताएं बढ़ गईं। संसाधनों के हिसाब से प्रयासों में और तेजी लाने की कोशिश की गई। अबू धाबी के भारतीय दूतावास में यहां के कामगारों की मदद में जुटे भारतीय कामगार संसाधन केंद्र (IWRC) से संपर्क स्थापित किया गया तो उन्होंने कोई जानकारी मिलने पर सूचना देने की बात कही।

अब सवाल यह है कि यदि किसी भारतीय के साथ विदेशों में कोई अनहोनी होती है तो इसमें उनके परिजनों की मदद के लिए कौन मौजूद है।

दूतावासों से संपर्क किया जाए तो जल्द कार्रवाई करने के 'सरकारी' जवाब मिलते हैं। विदेश मंत्रालय से बात की जाए तो वे दूतावास से संपर्क करने की बात कह देते हैं। एक दूसरे पर टोपी रखने का क्रम अनवरत चलता रहता है। निर्दोष भारतीयों के विदेशों में जाकर कहीं फंस जाने की स्थिति में भारत सरकार के पास क्या समाधान है।

इस बार सवाल 10 नवयुवकों का है। उनसे जुड़ी जिंदगियों का है। उन लोगों का है जिनके घर में उनके परिजन बेसब्री से उनका इंतजार कर रहे हैं। हर फोन की आहट पर उन्हें लगता है कि जैसे उनके बेटे ने आवाज दी है...

Friday, December 03, 2010

कुछ 'बड़े' व 'बेहतर' घोटालों की नींव अगले साल...

धर्मेंद्र कुमार
साल 2010... हर साल की तरह कुछ अच्छी-बुरी यादें छोड़कर जाने को तैयार है। कॉमनवेल्थ और एशियाड जैसे खेल के मैदानों में भारतीय नौजवानों ने अच्छा प्रदर्शन करके और भारतीय बाजार ने दो साल की मंदी के बाद सही राह पकड़कर जहां अच्छी स्मृतियां छोड़ी वहीं एक के बाद एक कई घोटालों ने पटल पर आकर खुशियों का मजा किरकिरा कर दिया।

साल की शुरुआत में चीनी ने मुंह में मिठास के बजाय कड़वाहट घोली। चीनी के आयात को लेकर कृषि मंत्री शरद पवार पर उंगलियां उठीं। लेकिन उन्होंने किसी भी गड़बड़ी से इनकार किया और बढ़ी कीमतों के लिए बाजार को जिम्मेदार ठहराया। विपक्ष ने संसद के अंदर और बाहर कई दिनों तक जोर लगाया। लेकिन आधा साल गुजरते-गुजरते चीनी के दाम फिर से गिरने लगे और लोग 'शांत' होने लगे। हां... इस दौरान कई लोग बहुत तेजी से अमीर हुए, ऐसा माना जाता है। बढ़ी कीमतों की असली वजह क्या थी... अब शायद न किसी को याद है और न जानने की जरूरत है।

आधा साल गुजरने के बाद सबका ध्यान कॉमनवेल्थ खेलों की ओर आ टिका। देश की राजधानी में कई प्रोजेक्ट शुरू किए गए। तमाम फ्लाईओवर और सड़कों का निर्माण इस दौरान अपने अंतिम चरण में पहुंचा। खेलों से जुड़ी व्यवस्थाओं को संवारने में जमकर लापरवाहियां हुईं। धांधलियों के आरोप लगे। ये आरोप मंत्रियों पर लगे, खेल समिति पर भी लगे और अधिकारियों पर भी। केंद्र सरकार और दिल्ली राज्य सरकार की भी अच्छी छीछालेदारी हुई। इस दौरान एक-दो बार मेट्रो रेल की निर्माणाधीन लाइनों पर दुर्घटना हुईं और फुट ओवर ब्रिज भी गिरा। खैर, जैसे-तैसे खेल खत्म हुए और अव्यवस्थाओं के जिम्मेदार लोगों की 'खोज' शुरू हुई। एकदूसरे पर आरोप लगाने के बाद जांच समिति बिठा दी गई। जांच समिति पर भी सवाल उठे।

'दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा' इस आश्वासन के साथ जांच जारी है। लेकिन अब साल का अंत होते-होते मामला कुछ ढीला सा पड़ता जा रहा है।

साल के दूसरे हिस्से में घोटालों के कई दूसरे मामले उभर कर आए। इनमें आदर्श सोसायटी मामला, कर्नाटक का जमीन मामला और सबका 'बाप' 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला रहा।

आदर्श सोसायटी घोटाला इसलिए आश्चर्यचकित करने वाला रहा क्योंकि इसमें नेताओं और मंत्रियों के अलावा सेना के कई बड़े अफसरों के दामन भी दागदार लगे। करगिल के शहीदों के लिए जो फ्लैट दिए जाने थे वे नेताओं और सेना के कुछ बड़े अधिकारियों के पास पहुंच गए। हल्ला मचा तो मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को इस्तीफा देना पड़ा। उनकी दिवंगत 'सास' सहित कई दूसरे रिश्तेदारों के नाम पर भी फ्लैट इस सोसायटी में पंजीकृत थे। जांच समिति इस मामले की भी जांच कर रही है।

इन सब घोटालों में अब तक कांग्रेस या उसके सहयोगी दलों के नेताओं पर आरोप लग रहे थे। लेकिन 'नेता-नेता मौसेरे भाई' हैं... ये सिद्ध किया कर्नाटक के जमीन आवंटन ने। प्रदेश में भाजपा सरकार के मुखिया येदियुरप्पा के लगभग हर रिश्तेदार के नाम सरकारी जमीन का मालिकाना हक निकल आया। इससे पहले के घोटालों पर जहां कांग्रेस की छीछालेदारी भाजपा सहित विपक्ष कर रहा था तो इस बार बारी कांग्रेस की थी। बात यहां तक पहुंची कि येदियुरप्पा की सरकार खतरे में पड़ गई। हालांकि भाजपा ने येदियुरप्पा को अभय दान दे दिया और उनकी सरकार बच गई। लेकिन भाजपा संसद में जिस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार की नाक में दम किए हुए थी, उसी मुद्दे पर उसे अपना चेहरा छुपाना मुश्किल हो गया। हमेशा की तरह जांच यहां भी जारी है।

साल खत्म होते-होते सभी घोटालों का 'बाप' उभरकर आया। ये था 2जी स्पेक्ट्रम मामला। पद से हटा दिए दूरसंचार मंत्री ए. राजा पर टेलीफोन कंपनियों को स्पेक्ट्रम आवंटन में पारदर्शिता न बरतने का गंभीर आरोप लगा। उनपर आरोप लगा कि उन्होंने बहुत सस्ते दामों पर ये स्पेक्ट्रम टेलीफोन कंपनियों को देकर देश को चूना लगाने का काम किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी माना कि जरूरी एहतियात नहीं बरते गए। लेकिन उनकी नाक के नीचे ये सब होता रहा।

हमारे देश में आजादी के बाद से ही घोटालों का एक लंबा इतिहास रहा है। कुछ दिन मामला गर्म रहता है। बाद में जांच समितियों के हाथों में मामला पहुंचने के बाद यकायक सब कुछ ठंडा पड़ने लगता है। लोगों की स्मृति कम होने की बात कही जाती रही है। कुछ हद तक यह सही भी है। इस साल के ताजा-ताजा कई घोटाले अपनी 'चमक' खोने लगे हैं। नए साल के चढ़ते खुमार के सहारे इन सभी घोटालों को भी भुला दिया जाएगा। हो सकता है अगले साल हम कुछ और 'बड़े' व 'बेहतर' घोटालों की नींव रखें।
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