Monday, June 08, 2009

नहीं रहे रंगमंच के 'हबीब' तनवीर

धर्मेंद्र कुमार
वरिष्ठ रंगकर्मी पद्मभूषण हबीब तनवीर का सुबह 6.30 बजे एक अस्पताल में हृदयगति रुकने से निधन हो गया।

रंगकर्म को एक नई बुलंदी तक ले जाने वाले हबीब तनवीर 86 वर्ष के थे और कई हफ्तों से बीमार थे। उन्हें पहले हजेला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें नेशनल अस्पताल ले जाया गया। उन्होंने जब आखिरी सांस ली तब उनकी बेटी नगीना उनके पास मौजूद थीं।

उनका जन्म अविभाजित मध्यप्रदेश के रायपुर में एक सितंबर 1923 को हुआ था। उनके पिता हफीज अहमद खान पेशावर (पाकिस्तान) के रहने वाले थे। स्कूली शिक्षा रायपुर और कला स्नातक की पढ़ाई नागपुर के मौरिस कॉलेज से करने के बाद वह एमए करने अलीगढ़ गए। युवा अवस्था में ही उन्होंने कविताएं लिखना आरंभ कर दिया था और उसी दौरान उपनाम तनवीर उनके साथ जुड़ा। वह 1945 में मुंबई गए और ऑल इंडिया रेडियो से बतौर प्रोड्यूसर जुड़ गए। उसी दौरान उन्होंने कुछ फिल्मों में गीत लिखने के साथ अभिनय भी किया।

मुंबई में तनवीर प्रगतिशील लेखक संघ और बाद में इंडियन पीपुल्स थियेटर (इप्टा) से जुड़े। ब्रिटिश काल में जब एक समय इप्टा से जुड़े अधिकांश वरिष्ठ रंगकर्मी जेल में थे उनसे इस संस्थान को संभालने के लिए भी कहा गया। बाद में 1954 में उन्होंने दिल्ली का रुख किया और वहां उन्होंने कुदेसिया जैदी के हिंदुस्तान थियेटर के साथ काम किया। इसी दौरान उन्होंने बच्चों के लिए भी कुछ नाटक किए।

दिल्ली में तनवीर की मुलाकात अभिनेत्री मोनिका मिश्रा से हुई जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। यहीं उन्होंने अपना पहला महत्वपूर्ण नाटक 'आगरा बाजार' किया। 1955 में तनवीर इग्लैंड गए और रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक्स आर्ट्स (राडा) में प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उन्होंने यूरोप का दौरा करने के साथ वहां के थियेटर को करीब से देखा और समझा।

अनुभवों का खजाना लेकर तनवीर 1958 में भारत लौटे और तब तक वह खुद को एक पूर्णकालिक निर्देशक के रूप में ढाल चुके थे। इसी समय उन्होंने शूद्रक के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक 'मृच्छकटिका' पर केंद्रित नाटक 'मिट्टी की गाड़ी' तैयार किया। इसी दौरान नया थियेटर की नींव तैयार होने लगी थी और छत्तीसगढ़ के छह लोक कलाकारों के साथ उन्होंने 1959 में भोपाल में 'नया थियेटर' की नींव डाली।

नया थियेटर ने भारत और विश्व रंगमंच पर अपनी अलग छाप छोड़ी। लोक कलाकारों के साथ किए गए प्रयोग ने नया थियेटर को नवाचार के एक गरिमापूर्ण संस्थान की छवि प्रदान की। 'चरणदास चोर' उनकी कालजयी कृति है। यह नाटक भारत सहित दुनिया में जहां भी हुआ सराहना और पुरस्कार अपने साथ लाया।

छत्तीसगढ़ की नाचा शैली में 1972 में किया गया उनका नाटक 'गांव का नाम ससुराल, मेरा नाम दामाद' ने भी खूब वाहवाही लूटी। नाटक 'जिने लाहौर नहीं वेख्या ओ जम्या नहीं' का नाम भी उनकी कालजयी रचनाओं में लिया जाता है।

प्यार और अकीदत से लोग उन्हें हबीब साहब कहते थे। उन्होंने फिल्मों के क्षेत्र में भी अपने हाथ आजमाए। कुछ फिल्मों की पटकथा लिखने के अलावा उन्होंने चंद फिल्मों में अभिनय भी किया था। उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की ऑस्कर विजेता फिल्म 'गांधी' में भी बतौर अभिनेता काम किया।

अपने जीवन काल में उन्होंने करीब 10 फिल्मों में भी काम किया। इनमें राही, फुटपाथ, गांधी, ये वो मंजिल तो नहीं, हीरो हीरालाल, प्रहार, मेंहदी और मंगल पांडे प्रमुख हैं। आमिर खान की 'मंगल पांडे' में उन्होंने बहादुर शाह जफर की भूमिका निभाई थी। उनकी आखिरी फिल्म सुभाष घई द्वारा बनाई गई 'ब्लैक एंड व्हाइट' थी। फिल्म निर्माण के क्षेत्र से भी वह सक्रिय रूप से जुड़े रहे। मशहूर फिल्म निर्माता सलीम के साथ जुड़कर उन्होंने कई फिल्मों के निर्माण में भी सहयोग दिया। इनमें मिट्टी, जिगर, दूध का कर्ज, द डॉन, मेंहदी आदि प्रमुख हैं।

विश्व रंगकर्म की जानीमानी शख्सियत हबीब तनवीर की जीवन शैली सादगीपसंद थी और वह सत्ता के गलियारों में कभी मदद की आस लेकर नहीं गए। हमेशा यह बात उठती रही कि अपना पूरा जीवन थियेटर को समर्पित करने के बाद भी उन्हें क्या मिला लेकिन तनवीर को इसका मलाल कभी नहीं रहा।

अपने जीवन की सांझ में वह आत्मकथात्मक पुस्तक पर काम कर रहे थे। समझा जाता है कि यह किताब पूर्णता के नजदीक पहुंच गई थी। अब यह जिम्मेदारी उनकी एकमात्र वारिस बेटी नगीना की है कि वह इस किताब को पाठकों तक पहुंचाए।

तनवीर को 1969 में और फिर 1996 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। 1983 मे पद्मश्री और 2002 में पद्मभूषण मिला। वह 1972 से लेकर 1978 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
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