Friday, December 21, 2012

गुजरात की जीत से खुला मोदी के पीएम बनने का रास्ता!

धर्मेंद्र कुमार   

गुजरात में नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार जीत का सेहरा पहना है। 'इंडिया शाइनिंग' के बाद भारतीय लोकतंत्र ने एक बार से फिर से साबित किया है कि उसके लिए किसी तरह के खास मीडिया अभियान कोई मतलब नहीं रखते। गौर से देखा जाए तो इस जीत में भविष्य के कई संकेत छिपे हैं।

गुजरात में 'मोदी मैजिक' के अलावा नि:संदेह कई और कारकों ने भी काम किया है लेकिन विकास के मुद्दे की अहमियत और भ्रष्टाचार रहित प्रशासन देने में मोदी को मिली सफलता ने लोगों को 'मन' बनाने में ज्यादा मुश्किल नहीं आने दी।

अपनी खुद की बनाई मुश्किलों से जूझती मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस मुकाबले के हर दौर में सुरक्षात्मक तरीके से खेलती नजर आई। केशूभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी संभवत: सिर्फ 'मोदी विरोध' के लिए ही लड़ती नजर आई। अब जबकि गुजरात में चुनाव हो गया है और मोदी गद्दीनशीं हो गए हैं तो वक्त है इस बात की चर्चा का कि मोदी की इस जीत से राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।

जैसा कि पहले यह कयास लगाया जा रहा था कि इस जीत से मोदी के लिए दिल्ली के रास्ते खुलेंगे... अब शायद इस बहस को और ज्यादा बल मिलेगा... कि मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के दावेदार बनेंगे या नहीं...।

एक नजर से देखें तो मोदी के लिए यह बड़ा मुश्किल काम है। देश की वर्तमान राजनीति यूपीए ओर एनडीए के हवाले है। मुसलमानों के खिलाफ बनी मोदी की छवि एनडीए के घटक दलों को विपरीत दिशा में खींचेगी। लेकिन सवाल यह भी है कि कांग्रेस की तेजी से गिरी छवि और भविष्य के नेतृत्व की सही परिभाषा गढ़ पाने में नाकामयाबी के चलते दूसरे दल उसका कितना साथ देंगे...। ऐसे में एक क्षीण संभावना तीसरे मोर्चे की भी बनती है लेकिन छोटे राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान को देखते हुए इसकी संभावना वास्तव में बहुत 'क्षीण' नजर आती है।

... तो ज्यादा संभावना इसी बात की नजर आती है कि राजनीतिक दलों का नया ध्रुवीकरण हो और एनडीए तथा यूपीए की नई परिभाषा बने। यदि ऐसा हुआ तो मोदी के प्रधानमंत्री बनने की राह 'थोड़ी' आसान हो सकती है... क्योंकि उत्तर के राजनीतिक दलों का साथ छोड़ देने पर दक्षिण के कुछ दल एनडीए से जुड़ सकते हैं। खासकर दक्षिण के वे दल जिनके लिए हिंदू-मुस्लिम राजनीति कोई खास महत्व नहीं रखती।

दूसरे, यदि ऐसा न हो सका और बीजेपी अलग-थलग पड़ी तो उसकी संभावना चुनाव के मैदान में पारंपरिक राजनीतिक साथियों के साथ ही जाने की बनती है। और तब बीजेपी संभवत: अपने पुराने मुद्दों के साथ राजनीतिक अखाड़े में कूदने का मन बना सकती है। नि:संदेह हालिया हाथ लगा विकास का मुद्दा भी उसके एजेंडे में ऊपर आ सकता है।

हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि गुजरात में विकास का मुद्दा चल गया है तो बाकी के देश में भी इस मसले पर वोट पड़ जाएंगे। ... और गुजरात की राजनीति के चश्मे से देश की राजनीति को देखना अतिशयोक्ति भी होगा... तो भी यह स्थिति नरेंद्र मोदी के लिए लाभप्रद होगी।

दूसरी ओर, यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी की अंदरूनी खींचतान मोदी के रास्ते में पत्थर बन सकती है लेकिन गुजरात चुनावों में मिली जीत से पार्टी के भीतर उनके विरोधियों के हौसले पस्त ही होंगे।

यदि सब कुछ ऐसे ही रहा और जनता ने कोई 'चौंकाने' वाला परिणाम नहीं दिया तो परिस्थितियां नरेंद्र मोदी के पक्ष में जा सकती हैं।

इन सब संभावनाओं को एक दायरे में रखकर यदि सोचा जाए तो मोदी के लिए रास्ता सुगम बनता है और साल 2014 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी हो सकता है। ... और यदि वह प्रधानमंत्री बनने में सफल हो जाते हैं तो देश की राजनीति किस करवट बैठेगी यह देखने वाली बात होगी।
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