Friday, January 09, 2015

‘डिजिटल इंडिया’ सिर्फ एक सपना या बनेगा हकीकत...

धर्मेंद्र कुमार

प्रधानमंत्री बनने के बाद नागरिकों के सशक्तिकरण के लिए डिजिटल इंफ्रास्‍टक्‍चर को प्राथमिकता देते हुए नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से घोषणा करते हुए कहा था कि उनकी सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ के लिए कार्य करने को प्रतिबद्ध है। इससे लोगों को सूचनाएं और सेवाएं समय पर और प्रभावी तरीके से मिल सकेंगी।

इससे कुछ समय पहले, लोकसभा चुनावों के दौरान, ‘फार्च्यून‘ पत्रिका के भारतीय संस्करण में ”100 चीजों को जानो तथा बहस करो, वोट करने से पहले” शीर्षक से एक लेख छापा गया था जिसमें सौ की सूची में 84वां विषय ‘निम्न सूचना प्रौद्योगिकी अनुपात‘ से संबंधित था। इसमें कहा गया था कि ”सन् 2013 में, इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन्स यूनियन ने 157 राष्ट्रों में से भारत को 121वें स्थान पर रखा था जो सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के मामले में काफी पीछे है।“ यह क्रमांक आईसीटी डेवलेप्मेंट सूचकांक के ‘संकेतकों पर आधारित है। जिन चीजों को ध्यान में लिया गया उनमें- प्रति 100 जनसंख्या पर इंटरनेट यूजर्स, वायरलेस और ब्रॉडबैंड पहुंच, मोबाइल उपभोक्ता और इंटरनेट बैंडविड्थ प्रति यूजर आदि शामिल हैं। इसपर टिप्पणी करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि ‘हमारी महान सूचना-तकनीक कुशलता के लिए बस इतना...!’

बहती गंगा में हाथ धोते हुए और अपने युवा वोट बैंक को निशाना बनाते हुए आम आदमी पार्टी ने भी कह डाला कि यदि दिल्ली में उनकी सरकार बनी तो पूरी राजधानी में वाई-फाई 'फ्री' होगा...।

‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम सरकार के सभी मंत्रालयों को देश के हर कोने से जोड़ने का एक प्रयास है। इसका उद्देश्य देश को डिजिटली सशक्त समाज और ज्ञान अर्थव्यवस्था के हब के रूप में परिवर्तित करना है। यह कार्यक्रम साल 2018 तक चरणबद्ध ढंग से लागू किया जाना है। इस कार्यक्रम से यह सुनिश्चित होगा कि सरकारी सेवाएं नागरिकों को इलेक्ट्रॉनिक रूप से उपलब्ध हों। इसके जरिए सार्वजनिक जवाबदेही भी बढ़ने की आशा है।

डिजिटल इंडिया के विजन क्षेत्रों को इस प्रकार से बांटा गया है कि इससे प्रत्येक नागरिक के लिए सुविधा के रूप में बुनियादी ढांचा तथा मुख्य सुविधा के रूप में हाई स्पीड इंटरनेट सभी ग्राम पंचायतों में उपलब्ध कराया जाएगा।

कुल मिलाकर, डिजिटल इंडिया के उद्देश्य ब्रॉडबैंड हाइवेज व मोबाइल कनेक्टिविटी सबको सुलभ कराना, पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम, ई-गवर्नेन्स यानी प्रौद्योगिकी के जरिए सरकार को सुधारना, ई-क्रांति यानी सेवाओं की इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी, सबके लिए जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, रोजगारों के लिए सूचना प्रौद्योगिकी तथा अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम्स आदि हैं।

वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में अपना पहला बजट पेश करते हुए कहा था कि यह कार्यक्रम ग्रामीण स्‍तर पर इंटरनेट की सुविधा, आईटी के माध्‍यम से सार्वजनिक सेवाओं तक लोगों की पहुंच, सरकारी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता लाने के साथ-साथ घरेलू उपलब्‍धता तथा निर्यात में वृद्धि के लिए आईटी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के देशी उत्‍पादन को बढ़ावा देने में कारगर साबित होगा। इस काम के लिए 500 करोड़ रुपये की मंजूरी भी दी गई थी।

लेकिन, वर्तमान में वस्तुस्थिति कुछ अलग ही कहानी कह रही है। सच यह है कि ब्रॉडबैंड कमीशन फॉर डिजिटल डेवलेपमेंट रिपोर्ट में भारत को 200 देशों में से 145वें क्रमांक पर रखा गया है। वास्तव में, भारत को कम से कम कनेक्टेड देशों के 39 के समूह में स्थान दिया गया है। इस 39 देशों के समूह में अधिकतर अन्य अफ्रीकी राष्ट्र हैं।

आलम यह है कि 'बैंडविड्थ' का कोई अता-पता नहीं है... पूरे देश में बैंडविड्थ का एक ‘बड़ा’ अभाव है। इस वजह से इंटरनेट बहुत 'धीमा' चलता है...। 'डिजिटल इंडिया' और 'फ्री' वाई-फाई जैसी चीज कहने से पहले इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बहुत काम करने की जरूरत है। फिलहाल, हमारा देश इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए पूरी तरह 'विदेशियों पर निर्भर' हैं। एक छोटा उद्ममी अपना सेटअप लगाना चाहे तो 'संभव' ही नहीं है...। सारे सर्वर विदेशियों के 'हवाले' हैं... और तो और... इसके चलते भारत में वेबसाइट बनवाने और चलाने वाले ग्राहक कहते हैं कि सर्वर 'अमेरिका' का होना चाहिए... जो कि बहुत 'सस्ता' और 'बेहतर' है...।

इतना ही नहीं मोदी ने जिस आधार कार्ड को फुल सपोर्ट दिया है उसका पूरा डेटाबेस अमेरिकी सर्वर पर रखा हुआ है। विशेषज्ञ अभिनय प्रसाद कहते हैं कि पहले उस डाटाबेस को ही भारत में लाओ...। डेटाबेस का स्वदेशी सर्वर पर होना और पूरी तरह सुरक्षित होना बहुत जरूरी है।

भारत में 'वैंडविड्थ' दूसरे बड़े देशों की तुलना में बहुत 'महंगी' भी है, इंटरनेट कनेक्शन कैसे चलते हैं... यह भी पता है सबको...। दिल्ली में आम आदमी पार्टी के दावे को लेकर साइबर विशेषज्ञ पंकज चोपड़ा कहते हैं कि 'मान लीजिए, बैंडविड्थ आ भी गई तो 'सुरक्षा' और 'प्राइवेसी' का क्या... 'हैकिंग' और 'मिस-यूज' बढ़ेगा सो अलग... यह एक बहुत बड़ा 'सपना' है। इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए सरकारों और नेताओं को कड़ी मेहनत करने की जरूरत है।

भारत में सर्वर लग सकें, वे सस्ते भी हों और बहुत कारगर भी हों... तथा इंटरनेट सेवाओं के ग्राहक कहें कि हमें भारत में लगा सर्वर चाहिए... तब मानो कि 'डिजिटल इंडिया' की ओर 'पहला' कदम चला देश...। फिलहाल, यह एक दिवास्वप्न से ज्यादा कुछ नहीं है। हालांकि, 'सपना' बहुत खूबसूरत है...।

(कुछ अंश विभिन्न रिपोर्ट और शोध कार्यों से लिए गए हैं) 
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