Friday, August 14, 2015

अवमूल्यन के 'चीनी' खेल में पिसेगा भारत...!


चीन राजनीतिक रूप से कितना 'भरोसेमंद' है, इसका अहसास भारत को साल 1962 के युद्ध के बाद से ही हो जाना चाहिए और व्यापार के मोर्चे पर कितना भरोसेमंद है, यह अब आने वाले कुछ दिनों में पता लगने वाला है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि देश के कई 'बड़े' नेताओं का मानना है कि यदि किसी देश के साथ अच्छे 'व्यापारिक' रिश्ते हैं तो इतने ही अच्छे 'कूटनीतिक' रिश्ते बनने में देर नहीं लगती। और... यह पूरी तरह 'गलत' सिद्ध होने जा रहा है।

चीन लगातार अपनी मुद्रा युआन का अवमूल्यन कर रहा है। चीन के इस कदम से युआन अन्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले काफी सस्ता हो गया है और अभी और सस्ता होगा। चीन को इसका फायदा उनके निर्यात में बढ़ोतरी के रूप में मिलेगा। चीन के इस कदम से भारतीय उत्पादों के लिए ग्लोबल बाजार, यहां तक कि स्थानीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। मतलब यह कि अब चीन से आयात और बढ़ जाएगा क्योंकि अवमूल्यन के बाद चीन से आने वाला हर सामान अब और अधिक सस्ता हो जाएगा। इसके चलते, यहां के उत्पादकों को चीन के सस्ते सामान से कड़ी स्पर्धा करनी पड़ेगी। भारत में बाजार पहले से ही चीन के सामान से पटा पड़ा है, यहां तक कि पूजा के लिए जरूरी लक्ष्मी-गणेश भी चीन से ही बनकर आ रहे हैं।

अब इसका एक इलाज यह नजर आ रहा है कि भारत रुपये का अवमूल्यन करे... ताकि निर्यात के जरिए कुछ संतुलन बनाया जा सके। लेकिन, ऐसा करने से डॉलर की तुलना में रुपया और गिर जाएगा। वर्तमान में यह 65 रुपये के ऊपर है। बिना अवमूल्यन के ही इसके 67 रुपये प्रति डॉलर तक जाने की आशंका है। यदि रुपये का अवमूल्यन हुआ तो यह आसानी से 70 रुपये प्रति डॉलर के स्तर को पार कर सकता है। अब आगे आने वाले दिनों की बस कल्पना ही करिए... 

Monday, July 27, 2015

या तो 'आक्रमण' न करते हुए 'बचाव' करते रहो या फिर 'उड़ा' ही दो...


इतनी बार कहा है कि पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लफड़े में मत पड़ो। जब भी 'पड़ोगे' ऐसे ही 'ठुकोगे'...। संबंध सुधारे जाते हैं 'चुनी' हुई सरकार से और पाकिस्तान में असल सत्ता है वहां की आर्मी। जैसे ही 'बेचारे' पाकिस्तानी नेता बात 'बनाने' की कोशिश भी करते हैं तो वहां आर्मीवाले 'एक्टिव' हो जाते हैं...। अब कर लो बात...। तो फिर 'सॉल्युशन' क्या है...? भाई, आर्मी का सॉल्युशन तो आर्मी ही हो सकती है। या तो 'आक्रमण' न करते हुए अपना 'बचाव' करते रहो। या फिर 'उड़ा' ही दो...।

जो 'गलती' अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी और रिटर्न गिफ्ट 'कारगिल' मिला था, वो ही गलत नरेंद्र मोदी कर रहे हैं और 'रिटर्न गिफ्ट' ले रहे हैं।

कांग्रेस वाले जब जब भी सरकार में आते हैं वे पाकिस्तान से बातचीत के लफड़े में 'कम' ही पड़ते हैं। सचिव स्तर वगैरह की बैठकें होती रहती हैं। कोई भी कांग्रेसी पीएम कभी भी पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने में 'अतिरिक्त उत्सुक' नहीं दिखा। इसके उलट, बीजेपी का हर प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारकर 'स्टेट्समैन' बनने की 'फिराक' में रहता है और हर बार 'धोखा' खाता है...।

(सभी फोटो इधर-उधर से ऐसे ही उठा लिए हैं। सबका आभार...)

Tuesday, July 14, 2015

साल 1948-49 और हमारे 'ताऊजी'



दौलतराम गुप्ता
साल 1948-49...। देश में आजादी की ताजी-ताजी हवा...। अवागढ़ रियासत में पड़ने वाले एक गांव का किसान मालगुजारी अदा करने 'देर' से पहुंचा तो राजा के कारिंदे ने लकड़ी की छड़ी मुंह पर दे मारी। चेहरे पर घाव लिए घर पहुंचने पर 20-22 साल के करीब छह फुट लंबे बेटे ने पूछा कि यह क्या 'लगा' है...? पिता ने सच्चाई बयां की तो बेटे ने आव देखा न ताव... और पहुंच गया कारिंदे के पास...। कारिंदा कहीं जाने के लिए घोड़े पर चढ़ रहा था। बेटे ने उसका पांव पकड़कर नीचे खींच लिया और अपना जूता निकालकर ...दे दनादन दे...। हक्का बक्का कारिंदा तत्काल समझ ही नहीं पाया कि ये हुआ क्या...। कारिंदे को लगभग मरणासन्न हालत में छोड़कर घर लौटे उस युवक को हफ्ते-दो-हफ्ते तक छुपा-छुपाकर रखना पड़ा। गांव के लोगों का कहना है कि उसके बाद उस 'कारिंदे' की कभी किसी से दुर्व्यवहार करने की हिम्मत नहीं पड़ी। उसे शायद यह समझ आ गया था कि देश की 'तस्वीर' बदल रही है... 'तौर-तरीके' बदल रहे हैं...। आज हमारे 'ताऊजी' नहीं रहे... पापाजी याद कर रहे हैं...
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