Tuesday, November 18, 2008

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...

धर्मेंद्र कुमार

दुनिया बदल रही है... शुरुआत सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका से हो रही है। इतिहास के पन्नों को पलटें, तो हर बार जब भी कोई बड़ी उथल-पुथल हुई, कई बड़ी शक्तियां धूल-धूसरित हो गईं और कुछ नई शक्तियां अंतरराष्ट्रीय पटल पर उभरकर आईं। यहां तक कि समय ने कई देशों के राजनीतिक नक्शे तक बदल डाले। पहले घोर आर्थिक संकट, फिर 219 साल के अमेरिकी इतिहास में पहली बार दुनिया के सबसे शक्तिशाली पद पर एक अश्वेत व्यक्ति काबिज हुआ।

हालांकि, बराक हुसैन ओबामा को अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी मिलने में कुछ भी 'आश्चर्यजनक' नहीं... पूरे चुनावी अभियान के दौरान लगभग सभी ओबामा को राष्ट्रपति मान ही चुके थे। चुनाव जीतने के बाद उनका सारी दुनिया को साथ लेकर चलने का संकल्प आर्थिक संकट से जूझते एक 'अमीर' देश में बड़ा परिवर्तन है। इराक से सैनिकों की वापसी और अफगानिस्तान में दूसरे देशों से सैन्य बलों को बढ़ाने के मसले पर ओबामा के रुख को भी इस नज़र से देखा जा सकता है। दुनिया की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए हाल ही में आयोजित ऐतिहासिक जी-20 शिखर सम्मेलन की प्रमुख घोषणा से स्पष्ट हो गया कि विकासशील देशों का समूह भविष्य में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के सुधारों में मुख्य भूमिका निभाएगा। इसमें जी-7 देशों की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं होने से यह भी साफ हो गया कि उभरती अर्थव्यवस्थाएं ही आने वाले दिनों में नीति निर्धारण की प्रक्रिया में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएंगी। यदि ऐसा हुआ तो भारत के लिए आर्थिक सिरमौर बनने की संभावनाएं काफी प्रबल हो जाएंगी। दुनिया के कई बड़े नेता तो नए शक्ति संतुलन के बारे में बोलने भी लगे हैं। बैठक के बाद ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइस इनैशियो लूला डी सिल्वा ने दुनिया के राजनीतिक भूगोल को नई दिशा में जाता हुआ बताया।

...तो यह है दुनिया का बदला हुआ चेहरा... इस संदर्भ में सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की ओर देखें, तो यहां भी पहली बार कुछ नई विमाएं दिख रही हैं... चलिए, एक नजर डालते हैं इन पर...

...आर्थिक संकट आया... पहले अमेरिका पर, फिर धीरे-धीरे इसने पैर पसारे दुनिया के सभी बड़े देशों में... कई अमेरिकी बैंक और वित्तीय संस्थान तबाह हुए... ब्रिटेन भी बचा नहीं रहा... असर दूसरे यूरोपियन देशों पर भी पड़ा... इधर, बाकी एशियाई देशों की तरह भारत भी इससे अछूता नहीं रहा... नि:संदेह, भारत पर असर पड़ा है... कुछ और पड़ना अभी बाकी है... लेकिन गौर कीजिए... दूसरे कई मजबूत देशों की तरह भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुमान पर मामूली अंतर ही पड़ा...

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने कुछ दिन पहले जारी अपने ताजा वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण में अनुमान ज़ाहिर किया था कि भारत की विकास दर 7-8 फीसदी रहेगी। जानकारों के अनुसार सात फीसदी की विकास दर भी चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। भारत फिर भी दुनिया में चीन के बाद दूसरी सबसे अधिक विकास दर दर्ज करने वाला देश होगा। कोई बैंक और वित्तीय संस्थान यहां तबाह नहीं हुआ। न ही ऐसी आशंका है। आईसीआईसीआई बैंक को लेकर कुछ अफवाहें ज़रूर आईं, लेकिन उसका एक्सपोज़र 'नाममात्र' को ही निकलकर आया। कुल मिलाकर साफ़ 'बच' गए हम...

विदेशी निवेश भी काफी निकल गया हमारे बाज़ारों से... विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस साल अब तक भारतीय बाज़ारों से 1200 करोड़ डॉलर निकाल लिए, लेकिन इसी दौरान करीब चार हज़ार करोड़ डॉलर की खरीदारी भी हुई, जो भारतीय निवेशकों ने की। यानि, सही मायने में 'करेक्शन'... विदेशी निवेशकों के आगे भी हाथ खींचते रहने से यदि बाज़ार गिरेगा तो भारतीय निवेशकों की खरीदारी अभी बाकी है। एक बड़ा नया निवेशक वर्ग कौड़ियों के भाव मिल रहे शेयरों को अपने पोर्टफोलियो में शामिल करने के लिए तैयार नज़र आ रहा है। हालांकि, बाज़ार में कोई भी निम्नतम स्तर की भविष्यवाणी नहीं कर सकता, लेकिन सेन्सेक्स 7700 के लेवल तक नीचे जा चुका है और तब से लगभग लगातार सुधर ही रहा है... अगले साल की पहली तिमाही में नई सरकार के बनने के बाद बाज़ार मजबूती की ओर ही जाना चाहिए... कोई वजह नज़र नहीं आती हमारी अर्थव्यवस्था के डूबने की...

आर्थिक विश्लेषकों द्वारा दिए जा रहे आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते नज़र आ रहे हैं। हां, कुछ औद्योगिक सेक्टरों पर मुश्किलों के बादल मंडरा रहे हैं। आउटसोर्सिंग और आईटी जैसे सेक्टर सीधे-सीधे अमेरिकी और दूसरे पश्चिमी देशों से जुड़े हैं। इसका असर हम पर कहीं न कहीं पड़ेगा, लेकिन पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था केवल इन्हीं क्षेत्रों पर टिकी हुई नहीं है। काफी हद तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर निर्भर होने का आरोप यहां धुलता-सा नज़र आता है। तेज झोंके की वजह से भारत हिला ज़रूर, लेकिन भड़भड़ाकर गिरा नहीं। आप कह सकते हैं कि 'गरीब' का क्या नुकसान और क्या फायदा... लेकिन सच यह है कि हम अब उतने 'गरीब' भी नहीं हैं...

इस वक्त कम से कम 'केवल एक विकासशील देश' ही नहीं हैं हम... इतने महत्वपूर्ण तो हम हैं ही कि अमेरिका हमारे साथ न्यूक्लियर डील करके 'खुश' हो सके। इतना ही नहीं, पिछले 60 साल के दौरान भारत को पाकिस्तान के संदर्भ में ही देखने के 'आदी' सुपर पॉवर को हमें एक अलग नज़रिये से देखने की ज़रूरत महसूस हुई... चाहे वह रिपब्लिकन बुश हों या डेमोक्रेट ओबामा, अब अमेरिका केवल कश्मीर मुद्दे पर ही भारत संबंधी बयान जारी नहीं करता, बल्कि दूसरी वजहों से भी उसे भारत की याद आती है। आने वाले दिनों में टूटती अर्थव्यवस्था को संभालने में जुटे अमेरिका को कई मोर्चों पर तेजी से उभर रहे भारत की मदद की दरकार रहेगी।

विविधताओं वाले बड़े देशों में भारत के सामने चीन की चुनौती है। चीन ने आर्थिक मोर्चे पर कोई कम उन्नति नहीं की है। भारत फिलहाल चीन से पीछे है... लेकिन इतना पीछे भी नहीं कि चुनौती का सामना न किया जा सके। भारत और चीन की आर्थिक उन्नति में एक बड़ा मौलिक अंतर यह है कि भारत ने जहां सेवा क्षेत्र में अपनी जगह बनाई है, वहीं चीन ने अपने उत्पादन क्षेत्र को बढ़ाया है। हमारे सेवा क्षेत्र उद्योग की पहुंच जहां केवल बड़े शहरों तक सीमित है, चीन में छोटी-छोटी उत्पादन इकाइयों ने अपनी पहुंच दूर-दराज के इलाकों में बनाई है और यही बात चीन को हमसे आगे करती है। यदि अगले साल चुनी जाने वाली सरकार से इस मोर्चे पर काम करने की उम्मीद की जाए तो हमारी औद्योगिकीकरण दर में बढ़ोतरी हो सकती है। जाहिर है, इससे रोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे और हमारी अर्थव्यवस्था चट्टान की तरह मजबूत बन सकेगी...
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